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"मैं से माँ बनने तक का सफर" 🤱 (नारी तू नारायणी है....)

ओउम् ।।
                 यत्र नार्यस्तु पुज्यन्ते
                                रमन्ते तत्र देवता

प्रेम अंधा क्यूँ होता है ? शायद इसलिए कि माँ बिना हमारा चेहरा देखे ही हमसे अनन्य प्रेम करने लगती है , सही मायने में प्रेम की कोई परिभाषा है तो वो माँ है ...
आज के ब्लाग में  मै से माँ बनने के खूबसूरत  व कठिनतम  सफर का जिक्र ... जो आपके अन्तर्मन को झकझोर कर रख देगा ....
(इस ब्लाॅग को लिखते वक्त गला रुंध गया है,  आखों से आँसू स्वतः ही निकल जा रहे हैं ...  अन्तर्मन से बार बार आवाज आ रही है क्या हम वाकई मर्द है  .... ? 
मातृशक्तियों के सानिध्य में प्रतिपल पल्लवित पुष्पित होने का सौभाग्य विरले ही मिलता है , यदि हमे यह सौभाग्य प्राप्त हुआ है तो जरूर यह हमारे पुण्य कर्मों  का प्रतिफल है  ..)  


संतान उत्पत्ति के लिए क्या आवश्यक है..? पुरुष का वीर्य और औरत का गर्भ !!!
बस इतना ही 🤔

लेकिन रुकिए ...
सिर्फ गर्भ ???
नहीं... नहीं...!!!
एक ऐसा शरीर जो इस क्रिया के लिए तैयार हो।
जबकि वीर्य के लिए 13 साल और 70 साल का
वीर्य भी चलेगा।
लेकिन गर्भाशय का मजबूत होना अति आवश्यक है,
इसलिए सेहत भी अच्छी होनी चाहिए।
एक ऐसी स्त्री का गर्भाशय
जिसको बाकायदा हर महीने समयानुसार
माहवारी (Period) आती हो।


जी हाँ !
वही माहवारी जिसको सभी स्त्रियाँ
हर महीने बर्दाश्त करती हैं।
बर्दाश्त इसलिए क्योंकि
महावारी (Period) उनका Choice नहीं है।
यह कुदरत के द्वारा दिया गया एक नियम है।

वही महावारी जिसमें शरीर पूरा अकड़ जाता है,
कमर लगता है टूट गयी हो,
पैरों की पिण्डलियाँ फटने लगती हैं,
लगता है पेड़ू में किसी ने पत्थर ठूँस दिये हों,
दर्द की हिलोरें सिहरन पैदा करती हैं।
ऊपर से लोगों की घटिया मानसिकता की वजह से इसको छुपा छुपा के रखना अपने आप में
किसी जँग से कम नहीं।

बच्चे को जन्म देते समय
असहनीय दर्द को बर्दाश्त करने के लिए
मानसिक और शारीरिक दोनो रूप से तैयार हों।
चालीस हड्डियाँ एक साथ टूटने जैसा दर्द
सहन करने की क्षमता से परिपूर्ण हों।


गर्भधारण करने के बाद शुरू के 3 से 4 महीने
जबरदस्त शारीरिक और हार्मोनल बदलाव के चलते
उल्टियाँ, थकान, अवसाद के लिए
मानसिक रूप से तैयार हों।
5वें से 9वें महीने तक अपने बढ़े हुए पेट और
शरीर के साथ सभी काम यथावत करने की शक्ति हो।


गर्भधारण के बाद कुछ
विशेष परिस्थितियों में तरह तरह के
हर दूसरे तीसरे दिन इंजेक्शन लगवानें की
हिम्मत रखती हों।
(जो कभी एक इंजेक्शन लगने पर भी
घर को अपने सिर पर उठा लेती थी।)
प्रसव पीड़ा को दो-चार, छः घंटे के अलावा,
दो दिन, तीन दिन तक बर्दाश्त कर सकने की क्षमता हो। और अगर फिर भी बच्चे का आगमन ना हो तो
गर्भ को चीर कर बच्चे को बाहर निकलवाने की
हिम्मत रखती हों।


अपने खूबसूरत शरीर में Stretch Marks और
Operation का निशान ताउम्र अपने साथ ढोने को तैयार हों। कभी कभी प्रसव के बाद दूध कम उतरने या ना उतरने की दशा में तरह-तरह के काढ़े और दवाई पीने का साहस रखती हों।
जो अपनी नीद को दाँव पर लगा कर
दिन और रात में कोई फर्क ना करती हो।
3 साल तक सिर्फ बच्चे के लिए ही जीने की शर्त पर गर्भधारण के लिए राजी होती हैं।
🤱🤱🤱🤱🤱🤱🤱🤱🤱🤱🤱


  • एक गर्भ में आने के बाद एक स्त्री की जो मनोदशा होती है , उसे एक पुरुष शायद ही कभी समझ पाये।
  • औरत तो स्वयं अपने आप में एक शक्ति है, बलिदान है।
  • इतना कुछ सहन करतें हुए भी वह तुम्हारें अच्छे-बुरे, पसन्द-नापसन्द का ख्याल रखती है
  • अरे जो पूजा करनें योग्य है जो पूज्यनीय है
  • उसे हम बस अपनी उपभोग समझते हैं।
  • उसके ज़िन्दगी के हर फैसले, खुशियों और धारणाओं पर हम अपना अंकुश रख कर खुद को मर्द समझते हैं।


इस घटिया मर्दानगी पर अगर इतना ही घमण्ड है हमें , तो बस एक दिन खुद को उनकी जगह रख कर देख लें
अगर ये दो कौड़ी की मर्दानगी
बिखर कर चकनाचूर न हो जाये तो कहना।


याद रखें
जो औरतों की इज्ज़त करना नहीं जानतें
वो कभी पुरूष हो ही नहीं सकतें....

यदि मेरे विचार आपको प्रभावित करते हैं तो इन्हें दूसरो तक भी पहुँचाने की कृपा करें 

Comments

  1. Replies
    1. सादर प्रणाम गुरूवर जी

      Delete
  2. Replies
    1. बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय श्री जी

      Delete
  3. Speechless 🙏🙏🙏💐💐

    ReplyDelete
    Replies
    1. बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीया Neha@indian जी

      Delete

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